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वीटो की शक्ति रखने वाले पांच स्थाई सदस्यों में भारत का दबदबा कायम

वीटो की शक्ति रखने वाले पांच स्थाई सदस्यों में भारत का दबदबा कायम

भोपाल। भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष व सांसद नंदकुमारसिंह चौहान ने कहा कि हाल में संपन्न अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में भारतीय न्यायधीश दलवीर भंडारी की जीत ने ब्रिटेन को 71 वर्ष बाद बाहर का रास्ता दिखा दिया है। हेग में न्यायधीश के पद के लिए हुए चुनाव में 11 राउंड में भारत ने दो तिहाई मतों से अपना पलड़ा भारी रखा, लेकिन सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य ब्रिटेन के पक्षधर रहे, लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में भारत को बार-बार मिले बहुमत ने ब्रिटेन को चुनाव से बाहर हो जाने को विवश कर दिया जिससे दूसरी बार दलवीर भंडारी अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में पदासीन हो गए। इससे वीटो की शक्ति रखने वाले पांच स्थाई सदस्यों ब्रिटेन, चीन, फ्रांस, रूस और अमेरिका पर भारत का दबदबा कायम कर दिया है।

उन्होंने कहा कि दूसरे विश्व महायुद्ध के बाद विजेता शक्तियों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सदस्यता हासिल कर वीटो की शक्ति के मालिक बन गए। तब से अब तक विश्व में बड़े परिवर्तन होने के बाद भी संयुक्त राष्ट्र संघ और सुरक्षा परिषद में कोई सुधार और विस्तार न होने से पूरा ढाचा अप्रासंगिक हो गया है। महासभा में भारत के लिए मिला समर्थन संगठन में सुधार और विस्तार का संकेत है लेकिन विश्व की शक्तियां इस तथ्य को पचा नहीं पा रही है। पांच स्थायी सदस्यों में से फ्रांस, भारत की दावेदारी का समर्थन करता है। भारत का प्रतिस्पर्धी चीन का कहना है कि संघ के सुधार का अनुकूल समय नहीं है और अमेरिका सदस्यता देने पर सहमत होते हुए वीटो विहीन सदस्यता का पक्षधर है। भारत ने स्पष्ट कहा है कि उसे सुरक्षा परिषद में वीटो संपन्न सदस्यता से कम कुछ भी बर्दाश्त नहीं है।

चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह विश्व के देशों का समर्थन हासिल कर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में भारत की पैठ बनाकर ब्रिटेन को बाहर किया है। सुरक्षा परिषद के सदस्य देशों के पेट में मरोड़ पैदा हो गया है लेकिन विश्व जनमत भारत के पक्ष में है जिसकी अधिक समय तक अनदेखी नहीं की जा सकती है। फिर भारत विश्व की चैथी अर्थव्यवस्था है जिसने शांति और रक्षा के प्रयासों में अभूतपूर्व योगदान देते हुए लोकतंत्र का सशक्तिकरण किया है। फिर भी उसे सुरक्षा परिषद की स्थाई वीटो सहित सदस्यता से वंचित रखा गया है। बदलते परिवेश में यह अधिक दिन नहीं चल सकता है। संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के संकेत को समझा जाना चाहिए।

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